पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/२३४

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२२. अपेक्षा अधिक उत्तम कर्तव्य खोजनेपर फलत्याग- के लिए स्थान नहीं रहता, इसलिए स्वधर्मको श्रेष्ठ कहा है। सब धोका फल उसके पालनमें आ जाता है। सहज कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धमेनाग्निरिवावृताः ॥४८॥ हे कौंतेय ! स्वभावतः प्राप्त कर्म, सदोष होनेपर भी छोड़ना न चाहिए। जिस प्रकार अग्निके साथ धुएंका संयोग है उसी प्रकार सब कामौके साथ दोष मौजूद है। ४८ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः । नैष्कर्म्यसिद्धि परमां संन्यासेनाधिगच्छति ।।४९।। जिसने सब कहींसे आसक्तिको खींच लिया है, जिसने कामनाओंको त्याग दिया है, जिसने मनको जीत लिया है, वह संन्यासद्वारा निष्कामतारूपी परम- सिद्धि पाता है। सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥५०॥ हे कोंतेय ! सिद्धि प्राप्त होनेपर मनुष्य ब्रह्मको किस प्रकार पाता है, सो मुझसे संक्षेपमें सुन । ज्ञानकी पराकाष्ठा वही है। ५०