पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/२३३

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15 २१ कृषिगौरज्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥४॥ खेती, गोरक्षा, व्यापार-ये वैश्यक स्वभावजन्य कर्म हैं। और शूद्रका स्वभावजन्य कर्म सेवा है। ४४ स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिखि लभते नरः । स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु ॥४५॥ स्वयं अपने कर्ममें रत रहकर पुरुष मोक्ष पाता है। अपने कर्ममें रत हुआ मनुष्य किस प्रकार मोक्ष पाता है, सो सुन ।" ४५ यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ।।४६॥ जिसके द्वारा प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है और जिसके द्वारा यह सारे-का-सारा व्याप्त है उसे जो पुरुष स्वकर्मद्वारा भजता है वह मोक्ष पाता है। ४६ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥४७॥ परधर्म सुकर होनेपर भी उससे विगुण स्वधर्म अधिक अच्छा है। स्वभाबके अनुरूप कर्म करनेवाले मनुष्यको पाप नहीं लगता। टिप्पणी स्वधर्म अर्थात् अपना कर्तव्य । गीताकी शिक्षाका मध्यबिंदु कर्मफलत्याग है और स्वकर्मकी