पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/२२२

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श्रीयमपान बोले- काम्य (कामनासे उत्पन्न हुए) कोंके त्यागको शानी संन्यासके नामसे जानते हैं। समस्त कर्मोंके फलके त्यागको बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं । २ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यशदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥३॥ कितने ही विचारवान पुरुष कहते हैं कि कर्ममात्र दोषमय होनेके कारण त्यागनेयोग्य हैं। दूसरोंका कथन है कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागनेयोग्य नहीं . mo निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः हे भरतसत्तम ! इस त्यागके विषयमें मेरा निर्णय सुन । हे पुरुषव्याघ्र ! त्याग तीन प्रकारसे वर्णन किया गया है। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यशो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥ यज्ञ, दान और तपरूपी कर्म त्याज्य नहीं हैं वरन् करनेयोग्य हैं। यज्ञ, दान और तप विवेकीको पावन करनेवाले हैं। ५