पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/२२१

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मनाया न्याय सम्पासपोप संन्यासयोग इस अध्यायको उपसंहाररूप मानना चाहिए। इस अध्यायका या गीताका प्रेरक मन्त्र यह कहा जा सकता -'सब धोको तजकर मेरी शरण ले।' यह सच्चा संन्यास है; परंतु सब धर्मोक त्यागका मतलब सब कोका त्याग नहीं है । परोपकारके कर्मोमें भी जो सर्वोत्कृष्ट कर्म हों उन्हें उसे अपंण करना और फलेच्छाका त्याग करना, यह सर्वधर्मत्याग या संन्यास है। अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्कशिनिषूदन ॥१॥ अर्जुन बोले- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! संन्यास और त्यागका पृथक्-पृथक् रहस्य में जानना चाहता हूं। श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥२॥ - १