पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/१६९

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जो मेरे दर्शन तूने किये हैं बह दर्शन न वेदसे, न सपसे, न दानसे अथवा न यज्ञसे हो सकते हैं। भक्त्या स्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । सातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥५४॥ परंतु हे अर्जुन ! हे परंतप ! मेरे संबंधमें ऐसा शान, ऐसे मेरे दर्शन और मुझमें वास्तविक प्रवेश केवल अनन्य भक्तिसे ही संभव है। मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥५५॥ हे पांडव ! जो सब कर्म मुझे समर्पण करता है, मुझमें परायण रहता है, मेरा भक्त बनता है, आसक्ति- का त्याग करता है और प्राणीमात्रमें द्वेषरहित होकर रहता है, वह मुझे पाता है। ॐ तत्सत् इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद अर्थात् ब्रह्म- विद्यांतर्गत योगशास्त्रके श्रीकृष्णार्जुनसंवादका 'विश्व- रूपदर्शनयोग' नामक ग्यारहवां अध्याय ।