पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/१११

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

सातवा मन्याय सामषिशानयोग हजारों मनुष्योंमेंसे कोई ही सिद्धिके लिए प्रयत्न करता है। प्रयत्न करनेवाले सिद्धोंमेंसे भी कोई ही मुझे वास्तविक रूपसे पहचानता है । भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥४॥ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंभाव--यह आठ प्रकारकी मेरी प्रकृति है। टिप्पमी-इन आठ तत्त्वोंवाला स्वरूप क्षेत्र या क्षर पुरुष है। (देखो अध्याय १३-५; और अध्याय १५-१६ ।) अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि में पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥ यह अपरा प्रकृति हुई। इससे भी ऊंची परा प्रकृति है, जो जीवरूप है। हे महाबाहो ! यह जमत उसके आधारपर निभ रहा है। एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृलस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥६॥ भूतमात्रकी उत्पत्तिका कारण तू इन दोनोंको मान । समूचे जगतकी उत्पत्ति और लयका कारण में हं। ६ मतः परतरं नान्यत्किचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोवं सूत्रे मणिगना इव ॥७॥