परंतु जब से पूर्वोक्त-घटना मारटिनीक में हुई है, तब से योरप और अमेरिका के विद्वानों का ध्यान इस शास्त्र की ओर
और भी अधिक खिंचा है। वे इस समय बड़ी-बड़ी परीक्षाओं द्वारा यह जानने का यत्न कर रहे हैं कि मनुष्येतर प्राणियों को किस प्रकार भावी आपत्तियों की सूचना हो जाती है। लोगों को आशा है कि किसी समय वे इस कार्य में अवश्य सफल काम होंगे, और निश्चित सिद्धांतों द्वारा मनुष्यों को नैसर्गिक अनर्थों से बचाने की कोई युक्ति निकालने में भी वे समर्थ होंगे। तथास्तु।
जुलाई, १९०३
जानवरों से हमारा मतलब पशुओं से है। क्या पशु भी विचार करते हैं, सोचते हैं, समझ रखते हैं या चिंतना करते हैं? हार्पस मैगेज़ीन-नामक एक अँगरेजी सामयिक पुस्तक में, एक साहब ने, इस विषय पर, एक लेख लिखा है। उसमें लेखक ने यह सिद्ध किया है कि जानवरों में समझ नहीं होती; वे किसी तरह का सोच-विचार नहीं कर सकते, क्योंकि वे बोल नहीं सकते। जिस प्राणी में बोलने की शक्ति नहीं, उसमें विचार करने की भी शक्ति नहीं हो सकती। इस विज्ञानी के सिद्धांतों का सारांश हम नीचे देते हैं---