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एक ही शरीर में अनेक आत्माएँ

टूई और सिपाही के उदाहरण

अमेरिका में एक विद्या-व्यसनी कुमारिका थी। उसने पढ़ने में बहुत श्रम किया। इससे १८ वर्ष की उम्र में उसकी तबियत बिगड़ गई। वह रोगी हो गई। कुछ दिन बाद उसके ऊपर टूई-नामक एक स्त्री प्रकट होने लगी। वह रोगी थी। पर टूई प्रसन्न चित्त और बलिष्ट मालूम होती थी। टूई मनमाना आती-जाती थी। जाते समय वह पत्र लिखकर रख जाती थी, जिससे उस रोगी कुमारिका का चित्त टूई के चले जाने पर भी प्रसन्न रहता था। कुछ दिन बाद टूई ने कहा, मैं चली जाऊँगी, और वाय-नामक एक व्यक्ति मेरे स्थान पर आवेगा। बाय आया। वह उन दोनो से परिचित हो गई। पर टूई और वाय तभी तक ठहरे, जब तक वह यथेष्ट आरोग्य नहीं हुई।

ऐसे ही एक सिपाही की कथा है, जो भिन्न-भिन्न व्यक्ति होकर दो-तीन दफ़े फ़ौज में भरती हुआ, और होश में आ जाने पर भाग जाने का अपराधी ठहराया गया। पर अब और ऐसी कथाएँ देने की ज़रुरत नहीं। इस विषय के उदाहरण बहुत हुए। जिस पुस्तक के आधार पर यह लेख लिखा जाता है, उसके कर्ता की अब राय सुनिए।

ग्रंथकर्ता की राय

ग्रंथकर्ता की राय में मनुष्य का मन एक चीज़ नहीं। आत्मा से वह पृथक् है। वह 'अहं' का बोधक नहीं। अनेक क्षणिक