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५४ :: अदल-बदल
 

इसका कानून से निराकरण अवश्य होना चाहिए। पर कोडबिल तो कुछ दूसरी ही रचना करता है। यह हिन्दू गृहस्थी को भंग करता है।"

'किस प्रकार?'

'तलाक का अधिकार देकर।'

'लेकिन तलाक का अधिकार तो अब रोका नहीं जा सकता।' डाक्टर ने तेज़ी से कहा।

'हां, मैं भी यही समझता हूं परन्तु मैं इसका कुछ दूसरा ही कारण समझता हूं, और आप दूसरा।'

'मेरा तो कहना यही है कि तलाक का अधिकार स्त्री को पुरुष के और पुरुष को स्त्री के जबर्दस्ती बन्धन से मुक्त करने के लिए है।' डाक्टर ने कहा।

'परन्तु मेरा विचार दूसरा है। असली बात यह है कि अंग्रेजों से हमने जो नई बातें अपने जीवन में समावेशित की हैं, उनमें एक नई बात 'एक पत्नीव्रत' है। हिन्दू लॉ के अनुसार हिन्दू गृहस्थ एक ही समय में एक से अनेक पत्नियों से विवाह कर और रख सकता है। आप जानते ही हैं कि प्राचीन काल के राजा-महाराजाओं के महलों में महिलाओं के रेवड़ भरे रहते थे। अंग्रेजों के संसर्ग से हमने दो बातें ही सीखीं। पहला 'एक पत्नीव्रत', दूसरा समाज में स्त्रियों का समान अधिकार। यद्यपि भारत में भी राम जैसे एक पत्नीव्रती पुरुष हो गए हैं--पर कानूनन अनेक पत्नी रखना निषिद्ध न था। अब भी हिन्दू लॉ के अधीन अनेक पत्नी रखी जा सकती हैं। परन्तु व्यवहार में यह हीन कर्म माना जाता है। अभी तक 'एक पत्नीव्रत' का कानून नहीं बना था। पुरुष चाहते तो अपनी स्त्री को त्याग दे सकते थे-- वह सिर्फ खाना-कपड़ा पाने का दावा कर सकती थी और पुरुष झट से दूसरा विवाह कर लेते थे। उसमें कोई बाधा न थी--परन्तु अब जब, 'एका पत्नीव्रत' कानूनन