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१५८ :: अदल-बदल
 

किशोरी वहां से भागने की कोशिश में थी, पर यही सबसे कठिन था। वह कुमुद से और भी अधिक सटकर बैठ गई। कुमुद ने बलपूर्वक उसके मुंह में इमरती ढूंस दी। उसने आंचल में मुंह छिपा लिया।

ये सभी दृश्य राजेश्वर के लिए असाधारण प्रभावशाली थे। किशोरी घबराकर वहां से उठकर जाने लगी। कुमुद ने बहुत रोका, पर वह चली गई।

राजेश्वर मन के उद्वेग को न रोककर बोले--'उसे नाराज क्यों कर दिया?'

'आपको क्या ज्यादा बुरा लगा?'

'उसे मनाना चाहिए।'

'तब मना लाइए।'

'मैं उससे क्या बोलूंगा, तुम उसे बुला लो।'

कुमुद ने बाहर आकर देखा, वह खड़ी हुई मिसरानी से बातें कर रही है। कुमुद ने भीतर पति की ओर ताककर कहा--'अब आप बाहर तशरीफ ले जाइए, तब वह आएगी।' राजेश्वर चले गए।

कुमुद ने किशोरी से कहा--'आ किशोरी, वह चले गए, अब क्यों भागती है!'

'किशोरी ने गर्दन टेढ़ी करके, ज़रा हंसकर कर कहा--'उन्हें क्यों भगा दिया?'

'तब बुलाऊं फिर?'

किशोरी हंसते-हंसते कुमुद से लिपट गई। उसने कहा--'जीजी यह तो बहुत अच्छे हैं।'

पति की इतनी मधुर आलोचना सुनकर कुमुद आनन्द-विभोर हो गई। उसने किशोरी के तड़ातड़ चुम्बन पर चुम्बन ले डाले।