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मरम्मत :: १४५
 


आऊंगा।' उन्होंने घड़ी निकाली और राजेन्द्र से कहा-- 'ज़रा एक तांगा तो मंगा दो।'

राजेन्द्र ने कहा--'तब जाओगे ही।' वे तांगे के लिए कहने बाहर चले गए। रजनी कुछ क्षण चुप खड़ी रही, फिर उसने कहा--'दिलीप बाबू, कहिए मुझ-सी कोई स्त्री दुनिया में है या नहीं?'

दिलीप ने एक वार सिर से पैर तक रजनी को देखा, फिर कहा--'अब तुम चाहे मुझे मार ही डालो, पर रजनी तुम-सी औरत दुनिया में न होगी।'

इस बार से 'तुम' और 'रजनी' का घनिष्ट सम्बोधन पाकर रजनी की आंखों से टप टप दो बूंद आंसू गिर गए। वह जल्दी से वहां से घर के भीतर चली गई।

तांगा आ गया। सामान रख दिया। गृहिणी के पैर छूकर ज्यों ही दिलीप बाबू ड्योढ़ी पर पहुंचे तो देखते क्या हैं कि रजनी टीके का सामान थाल में धरे रास्ता रोके खड़ी है। दिलीप और राजेन्द्र रुककर रजनी की ओर देखने लगे। रजनी के पास ही दुलरिया भी अपनी गहरी लाल रंग की संतरी साड़ी पहने खड़ी थी। उसके हाथ में थाल देकर रजनी ने दिलीप के माथे पर रोली-दही का टीका लगाया, चावल सिर पर बखेरे और दो-तीन दाने चने चबाने को दिए। इसके बाद उसने मुट्ठीभर बताशे दिलीप के मुख में भर दिए और वह खिलखिलाकर हंस पड़ी।

दिलीप हंस न सका। उसने उमड़ते हुए आंसुओं के वेग को रोककर फिर झुककर रजनी के पैर छुए। इसके बाद मनीबैग निकालकर थाल में डाल दिया।

राजेन्द्र ने कहा--'अरे दिलीप, तुम रजनो की इस ठग-विद्या में आ गए। मुझे भी यह इसी तरह ठगा करती है।'

दिलीप ने कहा--'बकवास मत करो। चुपचाप टिकट और