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पतित हो जाती है, उसे कुटनी पद मिलता है और उसकी वृद्धा- वस्था उसकी युवावस्था की अपेक्षा अधिक पापमय हो जाती है।

परन्तु दम्पति-धर्म में दीक्षा प्राप्त स्त्री ज्यों-ज्यों यौवन से ढलती है, पुत्र, पौत्र, परिजनों से संयुक्त रहती है। पवित्रता, श्रद्धा, सम्मान और गौरव की पद-पद पर वृद्धि पाती है, पुरुषों से कहीं अधिक स्त्रियों का आदर होता है। कुपुत्र भी माता की ओर सदा झुकता है। माता बनकर ही स्त्रियां जीवन का ध्येय पाती हैं। इसलिए जो स्त्री मातृपद से घृणा करे, उस स्त्री के दुर्भाग्य पर हमें दया करनी ही चाहिए। जो सौभाग्यवती स्त्री कोखवती नहीं, प्रसव की अधिकारिणी नहीं---वह स्त्री नहीं, स्त्रीत्व से हीन एक मांस-पिण्ड है। प्रत्येक स्त्री को जानना चाहिए कि उसके विवाह का उद्देश्य भोग-विलास नहीं। मैं कह चुका हूं, यह सब तो उस मूल आवश्यकता का आकर्षण है, मूल वस्तु पुत्र प्रसव है। स्त्री जाति पुत्र प्रसव करके ही पत्नी, माता, स्वामिनी सब कुछ बनती है और इसीसे उसका स्त्रीत्व धन्य होता है।

अब प्रश्न यह रह जाता है कि क्या कारण है कि कोई सुशिक्षिता, पुत्रवती, कोमल-हृदया नारी पति से और 'पति-घर' से तथा मातृपद से इतनी घृणा करे, पुरुष तक से प्रतिस्पर्धा रक्खे। यह तो है ही कि स्त्रियां स्त्रियां रहेंगी, पुरुष नहीं बन सकतीं, और पुरुष पुरुष ही रहेंगे, स्त्रियां नहीं बन सकते। इन महिला ने मुझे भी कट्टरपन्थी बताया है, सो तो सही है। मैं स्त्रियों को पुरुषोचित कामों में लाना बेवकूफी समझता हूं। मैं तो स्त्रियों को स्त्री ही रखना चाहता हूं। पुरुष और स्त्रियों के काम, स्वभाव, शरीर, सम्पत्ति, सब कुछ अलग है और उसीके अनुकूल दोनों को संसार-यात्रा करनी चाहिए। कलम लिखने के लिए है, और सूई सीने के लिए। यदि सूई से लिखेंगे और कलम से सीएंगे तो बन नहीं सकेगा। आप कह सकते हैं कि स्त्री-पुरुष समान हैं,