'भला यह भी कोई बात है, तुम्हारी हालत क्या है, यह तो देखो।'
माया ने दोनों हाथों से मुंह ढक लिया। उसने कहा-'तुम क्या मेरा एक उपकार कर दोगे ! थोड़ा जहर मुझे दे दोगे ! मैं वहां सड़क पर जाकर खा लूंगी।'
'यह क्या बात करती हो प्रभा की मां! हौसला रखो, सब ठीक हो जाएगा।
'हाय मैं कैसे कहूं ?'
'आखिर बात क्या है ?
'यह पापिन एक बच्चे की मां होने वाली है, तुम नहीं जानते।'
'जान गया प्रभा की मां, पर घबराओ मत, सब ठीक हो जाएगा।'
'हाय मेरा घर !'
'अब इन बातों को इस समय चर्चा मत करो।'
'तुम क्या मुझे क्षमा कर दोगे?'
'दुनिया में सब कुछ सहना पड़ता है, सब कुछ देखना पड़ता "
'अरे देवता, मैंने तुम्हें कभी नहीं पहचाना!'
'कुछ बात नहीं, कुछ बात नहीं, एक नींद तुम सो लो, प्रभा की मां।
'आह मरी, आह पीर।'
'अच्छा, अच्छा ! प्रभा बिटिया, तू ज़रा मां के पास बैठ, मैं अभी आता हूं बेटी। प्रभा की मां, घबराना नहीं, पास ही एक दाई रहती है, दस मिनट लगेंगे। हौसला रखना।' और वह कर्तव्यनिष्ठ मास्टर साहब, जल्दी-जल्दी घर से निकलकर, दीपावली की जलती हुई अनगिनत दीप-पंक्तियों को लगभग