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मेरे घर के पच्छिम ओर रहती है
बड़ी-बड़ी आँखों वाली वह युवती,
सारी कथा खुल-खुलकर कहती है
चितवन उसकी और चाल-ढाल उसकी।
पैदा हुई है ग़रीब के घर, पर
कोई जैसे ज़ेवरों से सजता हो,
उंभरते जोबन की भीड़ खाता हुआ
राग साज़ पर जैसे बजता हो।
आसमां को छूती हुई वह आवाज़
दिल के तार-तार से मिलाई हुई,
चढ़ाती है गिरने का जहाँ नहीं डर
कली की सुगन्ध जैसे छाई हुई।
चढ़ी हुई है वह किसी देवता पर
जहाँ से लगता है सारा जग सुन्दर।

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