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प्रहपहिला। पासवी- 'घावी हूँ पेटी। किन्सु छलना-सावधान । यह असस्य गय मानवसमाज का पड़ा भारी रात्रु है।" __ (पमा और वासवी नाती है) पट परिवर्तन। दृश्य दूसरा स्थान राजकीय प्रकोष्ठ । (महाराम पिम्पसार एकाकीप भापती पण विचार रहे।) म० विम्बसार-"माहा, जीवन की पूण मगुरता देख फर भी मानव कितनी गहरी नींव देना चाहमा है। आकाश के नीले पत्र पर उम्बस बसों से मिले हुए प्रष्ट के लेव जय धीरे धीर 'लोप होने लग है तमी सो मनुष्य प्रभात समझते लगता है, और ‘जीवा-तमाम में प्रवृत्त होकर भनेक भकाश सापडष करता है। और उधर प्रति उमे अन्य कार की गुफा में ले जाकर उसका शान्ति ।