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अपनी अपनी स्वतत्र फुजीनता और प्राचार रखनेयाल इन राष्ट्रों में-जिनमें से कई में गण वन्न शासन प्रणाली भी प्रचलित थी-निसर्ग नियमानुमार एकता का परिवर्तन (जिसका होना अनिवार्य पा), रजिनीति के कारण नहीं, किन्तु एक । ।घमिश कांति से, E होनेवाला था। वैदिक हिंसा-पर्म यज्ञों और पुरोहिसा के एफाधिकपत्य मे साधारण जनता के हय क्षेत्र में विद्रोह की सत्पत्ति हो रही थी। उसी के फल-स्वरूप जैन और यौद्ध धर्मों का प्रादुर्भाव में हुआ । 'घरम अहिंसावादी जैन धर्म के बाद योद्ध धर्म का प्रायुमें भर्भाव हुआ । वह हिंसा-मय घेव-याद मोर पूर्ण अहिमाबाली जैन । दाक्षात्रों के अति वाद से पचता हुआ एफ मध्यवर्ती नया मार्ग था । समवतः घर्म चक्र प्रवर्तन के समय गौतम ने इसी में अपने धर्म को मध्यमा प्रतिपदा के नाम में अभिहित किया। इसी धार्मिक मांति ने भास के भिन्न भिन्न राष्ट्रों को परस्पर सधिविग्रह करने के लिये पाध्य किया। इन्द्रप्रस्थ और अयोध्या के प्रभाव का हास होने पर इस धर्म के कारण, पाटलिपुत्र पीछे बहुत दिनों तक भारत की गजधानी पना रहा । उस समय के योद्ध-मन्यों में कार कड़े मुग ग्रहन से गष्ट्रों में स चार प्रमुस्थ राष्ट्रों का पत वर्णन है-कोराल, मगध, अवन्ती भौर पत्म । कागज का पुराना राष्ट्र ममवता मस काल के मय राष्ट्रा में विगत मयोता रखता या, किन्त प, जर हो रहा था। महाराज प्रमनजिन् फा पहाराज्य या। प्रवन्धी में प्रोत (पम्रोत ) का गग्य था। मालय का राष्ट्र भी तुम समय सबल था। मगध, जिसने फौग्यों के पाद भारम में महान् साम्राज्य स्थापित किया, गरियाली हो रहा था। विम्पमार घागजाये।