पृष्ठ:अजातशत्रु.djvu/१६४

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अजातशत्रु। - कात पहिला--" वय उन्होंने केवल यही कहा कि पपड़ामो नहीं । देवदच मेरा कुछ अनिष्ट नहीं कर सकता। वह स्वयं मेरे पास। नहीं आ सकता। उसमें इतनी शक्ति नहीं। क्योंकि इसमें द्वेष है।" दूसरा-" फिर क्या हुमा ?" । पहिला-'यही कि देववत समीप आने पर प्यास के कारण : उस सरोवर में जल पीने सतरा। कहा नहीं जा सकता कि उसे क्या हुआ-फोई माह पफर ले गया कि उसने लज्जा से सूबकर : प्रारम-हत्या कर ली। यह फिर उपर न दिखाई पड़ा।" दूसरा-"पाश्चर्य! गौसम की अमोघ शक्ति है। माई, ' इतना त्याग तो आज तक देखा नहीं गया। केवल परदुश्वर, कातरसा ने फिस प्राणी से राज्य छुराया है। महा-यह शान्त मुखमएडल, स्निग्ध गम्मीर प्टि किसको नहीं आफर्पित करती। कैसा विलक्षण प्रमाव है।" पहिला-"जभी दो बड़े पड़े सम्राट् लोग भी नत होकर उन- की आज्ञा पालन करते हैं। देखो यह मी कमी हो सकता था कि राजकुमार विरुद्धक पुन युवराम पनाये जावे । भगवान ने समझा कर महाराज को ठीक कर ही दिया-और ये मानन्द से युषराम बना दिये गये। । । । दूसरा-"हॉजी बनो, भाज वो भावस्वी मर में महोत्सव है। हम लोग भी घूम घूम कर मानन्द लें।" पहिला-"भावस्ती पर से पाया का मेष र, भानन्द दी भानन्द है। पर राजकुमारी का ३३०