पृष्ठ:अजातशत्रु.djvu/१६३

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महासरा। प्रचार कर के मानव इतना सुखी होता है, यह आज ही मालूम हुभा होगा । भगवान, क्या कभी वह भी दिन भावेगा, नप विश्व मर में एक कुटुम्ब स्थापित हो जायगा-मानव मात्र स्नेह से , अपनी गृहस्थी समालेगे। (माती है। (पटपरिवर्मन) दृश्यछटवा) . स्थान--पथ । (वातालाप करते हुए दो मागरिक) पहिला-"किसी ने फिफा ऐसा भी परिचय दिया है ? यह सहनशीलया का प्रत्यक्ष प्रमाण-मोह !" । दूसरा- देवदत्त का शोचनीय परिणाम देखकर मुझे वा माधब हो गया। जो एफ स्वतन्त्र संघ स्थापित करना चाहते थे उनकी यह दशा " - - - - 'पहिला-जप मयवान से भिनुमों ने कहा-कि देवच भोपका प्राण लेने परिहा है।इसे रोकना चाहिये ." सरात तब? " ," t १२४