पृष्ठ:अजातशत्रु.djvu/१३५

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भा दूसरा छलना-'कुमार विरुद्धक! क्या तुम अपने पिता के विरुद्ध सहे होंगे? और किस विश्वास पर विरुद्धक-"जय मैं पठच्युत और अपमानित व्यक्ति हूँ पत्र मुझे अधिकार है कि सैनिक कार्य में किसी का भी पक्ष प्रहण कर सफ, क्योंकि क्षत्रिय होने से मेरा यही धम्म है। हाँ पिता से में स्त्रय नहीं लहूंगा । इसी लिये कौशाम्मी की मेना पर मैं भारमण करना चाहता हूँ।" देवदत्त और छलना-'ष अविश्वास का समय नहीं है। रणवाध समीप ही सुनाई पड़ते हैं।" भजात०-"जैमो माता को आज्ञा ।" (घलना रीका प्रगतो करती है) (नेपध्य में रणवाय, विरुद्धक और भजात की युद्धयात्रा) (पदा फरता है) यवनिकापवन ।