पृष्ठ:अंधकारयुगीन भारत.djvu/११९

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(६३ ) बहुत बड़े बड़े दल बराबर पाया करते थे। इन लोगों का राज्य वंनु नदी के तट से लेकर बंगाल की खाड़ी तक' यमुना से लेकर नर्मदा तक और पश्चिम में काश्मीर तथा पंजाब से लेकर सिंध और काठियावाड़ तक और गुजरात, सिंध तथा बलोचिस्तान के समुद्र तक भली भाँति स्थापित हो गया था। प्रायः सौ वर्षों तक ये लोग बराबर यही कहा करते थे कि हम लोग दैवपुत्र हैं और हिंदुओं पर शासन करने का हमें ईश्वर की ओर से अधि- कार प्राप्त हुआ है और साथ ही इन लोगों के संबंध में यह भी एक बहुत प्रसिद्ध बात थी कि ये लोग बहुत ही कठोरतापूर्वक शासन करते थे। यों तो एक बार थोड़ी सी यूनानी प्रजा ने भी विशाल पारसी साम्राज्य के विरुद्ध सिर उठाया था और उसे ललकारा था, पर भार-शिवों के एक नेता ने, जो अज्ञात-वास से निकलकर तुखारों की इतनी बड़ी शक्ति के विरुद्ध सिर उठाया था और उसे ललकारा था, वह बहुत अधिक वीरता का काम था। १. वासुदेव के सिक्के पाटलिपुत्र तक की खुदाई में पाए गए थे- A. R. A. S; E. C. १६१३-१४, पृ० ७४ । यद्यपि कुशन और पूरी-कुशन सिक्कों का प्रभाव बंगाल की खाड़ी तक था, पर बिहार के बाहर साधारणतः राजमहल की पहाड़ियों तक ही उनका प्रचार तथा प्रभाव था । ऐसा प्रसिद्ध है कि उड़ीसा पर भी एक बार यवनों का श्राक्रमण हुश्रा था, पर यह अाक्रमण संभवतः कुशन यवनों का था। २. भेड़ाघाट में एक कुशन शिलालेख पाया गया है। ३. कनिष्क का पूर्वज बहतकीन अपने संबंध में जो जो बातें कहा करता था, उन्हें जानने के लिये देखो अलबेरूनी २, १० (J. B. O. R. S. खंड १८, पृ० २२५ ।)