पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/३५

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जिस दिन अभिराम स्वामी ने क्रोध करके बिमला को घर से निकाल दिया उसके दूसरे दिन संध्या को वह बैठी अपनी कोठरी में 'कंघी चोटी' कर रही थी। तीस बर्ष की बुढ़िया भी श्रृंगार करती है! क्यों नहीं, मन तो नहीं बूढ़ा होता और विशेषकर के रूपवती तो सर्वदा जवानही रहती हैं। हां कुरूपाके जवानी और बुढ़ापे में भेद होता है। बिमला तो रूप और रस दोनों से भरी पूरी थी वरन पुराना चावल और भी अच्छी तरह खिलता है। उसके लाल२ ओठों को देख कर कौन कहता कि बुढ़िया है, काजल लगे हुए मारू नयनों के कटाक्ष अपने सामने तरुणियों को क्या समझते थे। गोरे२ बदन पर नागिन सी लटैं गालों पर लटकती हुई कैसी भली मालूम होती थी। देखो! बायें हाथ से बालों को पकड़ कर कंघी करती हुइ मूर्ति को दर्पण में देखती और मुसकिराती और धीरे२ रस राग गाती हुई बिमला शांतीपुर की झीनी साड़ी के अंचल से घुटने के बीच में छातियों को छिपाये हुए कामारि के मन में भी काम उपजाती है।

जूड़े को बांंध बेणी पीठ पर लटका दी और एक इतर सुगन्ध मय रूमाल से मुंह को पोंछ महोवे की बीड़ी खाय ओठों पर धड़ी जमाय मुक्तामय कंचुकी कस और अंग२ सिजिल कर गुच्छेदार गुरगावी पैर में पहिन गले में वही युवराजदत्त माला धारण किये हुए बिमला तिलोत्तमा के घर चली।

तिलोत्तमा इस रूप को देख कर चकित हो हंस के बोली।

क्यों! आज तो बड़ा मोहनी रूप बनाया है।

बिमला ने कहा 'तुमका क्या?'

ति० भला बता तो आज किसका घर घालेगी?

बि०। मैं कुछ करूंगी तुझको क्या?