पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी प्रथम भाग.djvu/३३

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आठवां परिच्छेद।

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कुलतिलक।

जगतसिंह सेना लेकर अपने पितासे विदा हुए और विशेष बीरता प्रकाश पूर्वक पठानों में हलचल मचा दिया! उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि पांच सहस्त्र सेना से कतलूखां के पचास सहस्त्र सेना को सुवर्णरेखा पार उतार दूंगा। यद्यपि अभी तक कार्य्य सिद्ध नहीं हुआ था परन्तु उनके कर्तव्य की श्लाघा सुनकर मानसिंह ने समझा कि जगतसिंह द्वारा प्राचीन राजपूत गौरव पुनः प्रसिद्ध होगा।

जगतसिंह भलीभांति जानते थे कि पांच सहस्त्र सेना से पचास सहस्त्र सेना परास्त करना संपूर्ण भाव से असंभव है बरन प्राण बचना कठिन है। अतएव उन्होने ऐसी प्रणाली स्थापित की कि जिसमें संमुख संग्राम न करना पड़ै और अपनी सेना को सर्वदा छिपाये रहते थे। कधी सघन जङ्गल, कधी घाटी और कधी पहाड़ों की खोहों में रहते जिसमें किसी प्रकार किसी को उनका स्थान न मालूम हो और जहां कहीं सुन पाते कि पठानों की सेना अमुक स्थान पर है तुरन्त छापा मार कर उनका नाश करते थे। और बहुतेरे भेदिये कुंजड़े, कसाई, भिक्षुक, उदासी, और ब्राह्मण का भेष बनाये फिरा करते थे और पठानों की सेना का शोध लिया करते थे और पहिले से जाकर मार्ग में छिपे रहते थे जहां किसी पठान सेना को आते देखा वहीं निकल कर मार कूट के सब छीन लेते थे।