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द्वितीय खण्ड।


स्वामी ने फिर कहा 'एकाएक तुम को तिलोतमा के समीप ले चलना उचित नहीं है कौन जाने अधिक आनन्द सहन न कर सके। मैंने पहले से उससे कह रक्खा है कि तुम को बुलाया है तुम्हारे आने की सम्भावना है।

मैं पहिले उससे तुम्हारे आने का समाचार कह आऊं फिर तुम को ले चलूं।'

यह कह कर स्वामी जी भीतर चले गये। थोड़ी देर में फिर आकर बोले 'आओ।'

राजपुत्र उनके सङ्ग चलें। देखा तो एक कोने में एक टूटी चारपायी पर जर्जर शरीर तिलोत्तमा पड़ी है। अब भी उसका लावण्य प्रात कालीन नखत की भांति चमकता था। पट्टी के समीप एक विधवा स्त्री बैठी लेप कर रही थी। पहिले राजकुमार ने उस को नहीं चीन्हा--जधानी का देखा बुढ़ापे में पहिचाना नहीं जाता।

जब वे तिलोत्तमा के समीप खड़े हुए उस समय उस की आखें बन्द थी। अभिराम स्वामी ने पुकार कर कहा 'तिलोतमा राजकुमार जगतसिंह खड़े हैं।'

तिलोत्तमा ने आंस खोल कर जगतसिंह की ओर देखा--वह दृष्टि कोमल और स्नेह मयी थी! तिरस्कार का लेश भी न था। देखतेही उसने आंखें नीची कर लीं और आंसू की धारा बहने लगी। राजकुमार से फिर रहा न गया, लज्जा दूर भागी। तिलोत्तमा के पैताने गिर पड़े और रोने लगे।

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