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द्वितीय खण्ड।



भूल जाय तब भी मैं इसकी प्रेमाकांक्षी दासी बनी रहूंगी ! और सुनो। यदि पूछो कि इतनी देर अकेली मैं क्या बातें करती थी तो सुनो धन से विनय से जैसे होगा पहरेवालों को बश करूं, पिता के घोड़सार से घोड़ा हूँ और इस बन्दी को अभी इसके पिता के लश्कर में पहुँचाऊँ परन्तु इसको स्वीकृत नहीं है, नदी तो अब तक तुम इसकी परछांहीं भी न देख पाते।"

आंसू पोंछ कर थोड़ी देर चुप रही फिर मधुर भाव से बोली, उसमान, इतनी बातें कह कर मैंने तुमको बड़ा क्लेश दिया, मेरा अपराध क्षमा करो तुम को मेरा स्नेह है और मुझ को तुम्हारा स्नेह है यह हम को उचित नहीं था। किन्तु तुमने हमारा विश्वास नहीं किया। आयेशा जो काम करती है उसको छिपाती नहीं। आज तुम्हारे सामने कहा है यदि काम पड़ेगा तो कल पिता के सामने भी ऐसाही कहूंगी।'

फिर जगतसिंह की ओर देख कर बोली, 'आप भी मेरा अपराध क्षमा करें। यदि उसमान ने आज हमको दुःख न दिया होता तो कदापि इस बात को प्रकाशन करती -- तीसरे कान तक न पहुँचन देती।'

राजपुत्र चुपचाप खड़े अन्तर्ज्वाला से हृदय को जला रहे थे उसमान ने भी कुछ नहीं कहा, आयेशा ने कहा।

उसमान, यदि मैंने कोई अपराध किया हो तो क्षमा करना, मैं वही तुम्हारी प्यारी बहिन हूं और बहिन समझ कर तुमको भी प्रेम संकोच न करना चाहिये । अब मुझको इस औसर पर निराश होकर डुबाओ मत।

यह कहकर दासी के आने की आशा छोड़ अकेली चल खड़ी हुई । उसमान थोड़ी देर भयचक सा होरहा और फिर अपने स्थान को चला गया।

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