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दुर्गेशनन्दिनी।



जा सक्ती। तुम हमारे सङ्ग चलो घोड़सार में घोड़े बंधे हैं, मैं एक तुमको दे दूंगी तुम अपने लश्कर में चले जाओ।

राजपुत्र को बड़ा आश्चर्य हुआ और कुछ उत्तर न दे सक आयेशा फिर बोली, 'जगतसिंह आओ चलो।

राजकुमार बोले 'आयेशा ! क्या तुम हमको कारागार से निकाल दोगी ?'

आयेशा ने कहा 'अभी इसी दण्ड।'

ज०-अपने पिता की आज्ञा से?

आ०-आप इसकी कुछ चिन्ता न करें जब आप लश्कर में पहुंच लेंगे तब मैं उनसे कहूंगी। 'पहरेवाले कैसे जाने देंगे ?'

आयेशा ने अपने गले में से रत्न जड़ित कंठा निकाल कर कहा 'पहरे वाले इसकी लालच से छोड़ देंगे।'

फिर राजपुत्र ने कहाँ 'जब यह बात प्रकाशित होगी तो तुम्हारा पिता तुमको दंड न देगा?

'इस में कुछ हानि नहीं।'

'मैं न जाउंगा।'

आयेशा का मुंह सूख गया और उदास होकर बोली क्यों?' जा-'हम अपने प्राण बचाने के लिये तुम को दुःख नहीं दे सकते।'

'क्या आप वास्तविक न जायगे ?'

राजकुमार ने कहा 'तुम अकेली जाओ।'

आयेशा फिर चुप रह गयी और आंखों से आंसू चलने लगे।

उसको रोते देख राजपुत्र ने कहा आयेशा क्यों रोती हो ?'

आयेशा ने उत्तर नहीं दिया। फिर राजपुत्र ने कहा।

आयेशि! तुम अपने इस रोमे का कारण मुस से कहो केवल