पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/६२

यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
५९
द्वितीय खण्ड।


जगतसिंह ने यह बातें ऐसे स्वर से कहीं कि आयेशा को भी दुःख होने लगा और बोली 'आप ऐसे निराश क्यों होते हैं ! सबै दिन नाहिं घरावर जात।'

जगतसिंह ने कहा मैं निराश नहीं होता हूं पर अब आशा करके क्या करना है ? अब यही इच्छा है कि इस पापी जीवन का त्याग करूं ! अब इस कारागार को छोड़ने की अभिलाषा नहीं हैं।'

इस करुणामय बचन को सुन कर आयेशा बहुत विस्मित हुई और कातर भी हुई और राजकुमार प्रति विशेष स्नेह उत्पन्न हुआ और उसने उनका हाथ पकड़ लिया। थोड़ी देर में हाथ जोड़ कर उनके मुंह की ओर देख करके बोली।

'जगतसिंह ! ऐसा दुःख क्यों करते हो ? मुझको अन्य न समझो। यदि साहस दो तो मैं कहूं-बीरेन्द्रसिंह की कन्या कि—

उसकी बात पूरी न होने पायी कि राजकुमार बोल उठे 'उस बात से कुछ काम नहीं वह तो स्वप्न था होगया।'

आयेशा चुप रही और जगतसिंह भी चुप रहे। फिर आयेशा ने मुंह नीचा कर लिया।

राजपुत्र कांप उठे और उनके हाथ पर एक बून्द पानी का गिरा। नीचे आंख करके देखा तो आयेशा रोती थी और कंठ पर्यन्त आंसू की धारा बह रही थी।

विस्मित होकर बाले 'आयेशा यह क्या, तुम रोती क्यों हो ! आयेशा चुप चाप फल को नोचती रही अन्त को बोली।

'युबराज ! मैं यह नहीं जानती थी कि आज तुमसे इस तरह बिदा हूंगी। मैं तो सब क्लेश सह सकी हूं परन्तुं तुम को अकेले इस कारागार का दुख भोगने को छोड़ कर नहींbr>