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दुर्गेशनन्दिनी।



एक घुंघट काढ़े है। दुर से उसके उन्नत शरीर और गजगति से जाना कि दासी साथ लिये आयेशा आपही भाती है।

जब दोनों द्वार पर पहुंच गयीं पहरे वाले ने अंगूठी वाले से पूछा “यह भी दोनो भीतर जाँयगी ?”

उसने कहा ‘तुम जानो-मैं नहीं जानता।’

रक्षक ने कहा ‘वेश’ और दोनों स्त्रियों को रोक दिया। आयेशा ने घुंघट हटा कर कहा ‘हमको जाने दो यदि इसमें तुम्हारी कोई हानि हो तो मैं दोषी हूंगी।’

पहरे वाला आयेशा को चीन्हता नहीं था परन्तु दासी ने उसके कान में कहा कि “यह नवाब की बेटी है। उसने हाथ जोड़ा और कहा ‘हमारे अज्ञात अपराध को क्षमा कीजिये’ आप को जाने की कहीं रोक नहीं है।’

आयेशा भीतर धुसी। यद्यपि वह हंसती नहीं थी पर मुर्ख उसका प्रफुल्ल कमल की भांति खिला हुआ था। कारागार दीप्तिमान होगया।

उसने राजपुत्र से पूछा ‘यह क्या हुआ ?’

रजपुत्र ने कुछ उत्तर नहीं दिया, उंगली से तिलोत्तमा की ओर संकेत कर दिया। तिलोत्तमा को देखकर भायेशा ने पूछा ‘यह कौन है ?’ राजपुत्र ने संकोच से कहा ‘वीरेन्द्रसिंह की कन्या’।

आयेशा ने उसको गोदी में उठा लिया और दासी के हाथ से गुलाब लेकर उसके मुंह पर छिड़कने लगी। दासी पंखा झलने लगी। तिलोत्तमा चैतन्य हुई और उठ बैठी। मन में आया कि यहां से चलदे पर पुरानी बातों का ध्यान आ गया और फिर सिर घूमने लगा। आयेशा ने उसका हाथ पकड़ कर कहा ‘बहिन’ तुम क्यों घबराती हो ? तुम्हारे शरीर में