पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/५६

यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
५३
द्वितीय खण्ड।


तिलोत्तमा के मुंह से शब्द नहीं निकला मानो घबरा सी गई और कलेजा धड़कने लगा आँखें खुली थीं परंतु आगे का मार्ग नहीं सूझता था। इतने में मुंह से आकस्मित जगतसिंह का नाम निकला।

पहरेवाले ने कहा 'जगतसिंह तो कारागार में हैं वहां कोई जा नहीं सकता। किंतु हम को यह आशा है कि तुम जहां कहो वहां तुम को पहुँचा दें अतएव चलो वहीं लेचले।'

फिर वह दुर्ग में घुसा और तिलोत्तमा भी कठपुतली की भांति उसके पीछे २ चली। कारागार के द्वार पर उसने जाकर देखा कि सब पहरेवाले सजग अपने २ काम में चैतन्य हैं। एक से पूछा कि राजपुत्र कहां हैं ? उसने उङ्गली से दिखा दिया। फिर इसने पूछा कि जागते हैं कि सोते ? वह द्वार पर्यन्त गया और आकर कहने लगा 'जागते हैं।'

अंगूठी वाले ने कहा 'द्वार खोल दो यह स्त्री उनसे भेंट करेगी।'

पहरे वाले ने कहा “क्या ? ऐसी आशा नहीं है।"

तब अंगठी वाले ने उसमान का चिन्ह दिखाया और उसने तुरंत केवाड़ खोल दिया।

राजकुमार एक सामान्य चारपाई पर लेटे थे, द्वार के खुलने का शब्द सुनकर उठ बैठे। तिलोत्तमा द्वार पर ठिठक रही।

अंगूठी वाले ने कहा 'चलो यहां क्यों खड़ी हो रही' ? तिसपर भी तिलोत्तमा आगे नहीं बढ़ी, फिर उसने कहा 'चलो, यहां ठहरना उचित नहीं है।'

तिलोत्तमा पीछे हटने लगी परंतु उधर को भी पैर नहीं उठा प्रहरी घबराया।