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द्वितीयखण्ड।



स्त्री मुख पर सौन्दर्य वा अलंकार के गर्व का कोई चिन्ह नहीं दरसता था। इसी कुछ भी नहीं थी। आनन की कांति भी गम्भीर और स्थिर थी और आंखों से फटोरपन बरसता था।

इसी प्रकार भ्रमण करते २ बिमला परम शोमामय भवन में घुसी और पीछे से द्वार बंद कर दिया। इस महोत्सव के दिन भी उसमें केवल एक सलिन ज्योति दीपक जलता था। एक कोने में एक पलंग पर बिछौने के कोने से मुंह ढापे एक स्त्री पड़ी थी। बिमला पट्टी के समीप खड़ी होकर मीठे स्वर से बोली मैं आई हूं।

सोने वाली ने चिहुंक कर मुंह खोला,विमला को‌‌ बीन्ह कर उठ बैठी किन्तु कछ बोली नहीं।

बिमला ने फिर कहा तिलोत्तमा। मैं आई हूं।

तिसपर भी तिलोत्तमा ने कुछ उत्तर नहीं दिया परन विमला के मुंह की ओर घूरती रही।

अब वह रूप तिलोत्तमा का नहीं रहा। शरीर दुबला हो गया,मुंह सूख गया,एक मेली लंगोटी लगाये पड़ी थी‌।

उङ्गाली में एक छल्ला भी नहीं था केवल प्राचीन अलंकार के चिन्ह जहां तहां दिखाई देते थे।

विमला ने फिर कहा 'मैं अपने कहने के अनुसार आई हूँ तु बोलती क्यों नहीं ?

तिलोत्तमा ने कहा 'जो कहना था सो सब कह चुकी अब क्या कहूं' ?

विमला ने तिलोत्तमा की झोली से जाना कि वह रोती है। मस्तक पकड़ कर उठाया और आस पोछने लगी। आंचल सव भीग रहा था और विछीना भी गीला होगया था।

विमला नें कहा ‘इस प्रकार दिन रात रोती रहेगी तो कब तक जायगी ?’