पृष्ठ:दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग.djvu/२९

यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
२६
दुर्गेशनन्दिनी।



सङ्ग मेरी बड़ी प्रीत थी मैंने उसको प्रीतम का समाचार लेने को भेजा। उसने उनका पता लगाया उन्होंने अनेक प्रकार की बातें कहीं। उसके उत्तर में मैंने उनको पत्र लिखा। उन्होंने उसका प्रति उत्तर दिया और इसी प्रकार हमारे उनके पत्र व्यवहार होने लगा।

इस रीति से तीन वर्ष बीत गया और परस्पर विस्मरण नहीं हुआ तब मुझको प्रतीत हुई कि यह प्रीत कच्ची नहीं है। इसका कारण क्या था मैं नहीं कह सक्ती। एक दिन रात्रि को मैं अकेली अपने शयनागार में सोई थी और दीप मन्द ज्योति से जल रहा था कि एक मनुष्य की परछाई देख पड़ी और किसी ने मेरे कान में धीरे से कहा 'प्यारी डरो मत मैं तुम्हारा दास हूं।'

मैं क्या उत्तर देती ? तीन वर्ष पर भेंट हुई सब बातें खुल गई गले लग कर रोने लगी।

फिर मैंने पूछा 'तुम कैसे इस पुरी में पहुंचे?' उन्होंने कहा 'आसमानी से पूछो, उसको साथ लेकर पवन के रथ पर चढ़कर आया हूँ इसी लिये अभी तक छिपा था।'

मैंने पूछा 'अब?'

उन्होंने कहा 'अब क्या? तुम चाहो सो करो।'

मैं सोचने लगी कि अब क्या करूं कहां रक्खूं? इतने में किसी ने मेरे शयनागार का द्वार खोला। देखूं तो महाराज मानसिंह आगे खड़े हैं। और क्या कहूं प्रीतम बन्दी कर लिये गए और दण्ड देने की भी आज्ञा हुई। मैं जाकर उर्मिला के चरण पर गिर पड़ी और सम्पूर्ण समाचार कह सुनाया। पिता से जब भेंट हुई उनके भी पैर पर गिर पड़ी। महाराज उनकी मानते थे और गुरू के तुल्य समझते थे मैंने उन से कहा