पृष्ठ:कबीर ग्रंथावली.djvu/३१

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१४५६ में ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा चंद्रवार को ही पड़ती है। अतएव यही संवत् कबीर के जन्म का ठीक संवत् जान पड़ता है।

 इनके निधन के संबंध में दो तिथियाँ प्रसिद्ध हैं-
  (१) संवत् पंद्रह सौ श्री पांच मौ, मगहर कियो गमन ।
      अगहन सुदी एकादसी, मिले पवन में पवन ।।
 ( २ ) संवत् पंद्रह सौ पछत्तरा, कियो मगहर को गवन ।
       माघ सुदी एकादशी, रलो पवन में पवन ।।

एक के अनुसार इनका परलोकवास संवत् १५०५ में और दूसरे के अनुसार १५७५ में ठहरता है। दोनों तिथियों में ७० वर्ष का अंतर है। वार न दिए रहने के कारण ज्योतिष की गणना से तिथियों की जाँच नहीं की जा सकती।

 डाकृर फ्यूरी ने अपने 'मानुमेंटल एंटोकिटीज़ प्राफ दि नार्थ

वेस्टर्न प्राविंसेज़' नामक ग्रंथ में लिखा है कि बस्ती जिले के मग- हर ग्राम में, आमी नदी के दक्षिण तट पर. कबीरदास जी का रौजा है जिसे सन् १४५० (संक्त १५०७ ) में बिजलीखाँ ने बनवाया और जिसका जीर्णोद्धार सन् १५६७ ( संवत् १६२४ ) में नवाब फिदाई खाँ ने कराया। यदि ये संवत् ठीक हैं तो कबीर की मृत्यु संवत् १५०७ के पहले ही हो चुकी थी। इस बात को ध्यान में रखकर देखने से १५०५ ही इनका निधन संवत् ठहरता और इनकी जन्म संवत् १४५६ मान लेने से इनकी आयु केवल ४६ वर्ष की ठहरती है। मेरा अनुमान था कि डाकृर फ्यूरी ने मगहर के रौजे के बनने तथा जीर्णोद्धार के संवत् उसमें खुदे किसी शिला- लेख के आधार पर दिए होंगे। इस अनुमान से मैं बहुत प्रसन्न था कि इस शिलालेख के आधार पर कबीरजी का समय निश्चित हो जायगा; पर पूछ ताछ करने पर पता लगा कि वहाँ कोई शिला-लेख नहीं है। डाकृर साहब ने जिस ढंग से ये संवत् दिए हैं.